कहानी पढी .. एक आम मुसलमान के मन में बैठे दर को उजागर करती है..छोटी छोटी बातो को कहाने में किस तरह से बड़ा करके दिखाया गया है उससे लेखक की मंशा भली भाँती पता चलाती है..के भयानक दंगो का दौर मन को पीड़ा पहुचाता है...मुसलमानों में हिंदू बहुसंख्यकवाद का डर किस कदर बैठा हुआ है लेखक चाहता हो तो बहुत अच्छी तरह से उस डर को उकेर सकता था मगर कहानी का स्तर सामान्य ही रहा ..
भारत ही नहीं दुनिया में आज मुसलिम समुदाय अन्यों से अलग थलग पड़ रहा हैं, यह किसी के लिए भी शुभ नहीं हैं. पर स्थीति को ठीक करने की जिम्मेदारी भी इसी समुदाय की हैं. आज के हालात में पढ़ालिखा मुसलमान भी कट्टर होता जा रहा हैं, जो भय जगाता हैं. क्या अपने अस्तित्व को बचाने के लिए हमें भी कट्टरता को अपनाना पड़ेगा? भगवान न करे ऐसा करना पड़े.
लेकिन मै मानता हूँ कि मुस्लिम युवाओं को भडकाया जा रहा है और सहृदय मुस्लिमों की संख्या कम हो रही है...देखिये हिन्दू हो या मुसलमान परम्परावादी, ईश्वरवादी, भारतवासी अपनी जन्मभूमी की मिट्टी में ही अपना अन्त चाहता है..चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान ..लेखक की ये ही बात मुझे बहुत अच्छी लगी ..शहरोज़ भाई पाकिस्तान का निर्माण साधारण जनता की इच्छा न होकर राजनीतिक स्वार्थ का परिणाम था। यही कारण है कि भारतीय मुसलमान विभाजन से अप्रसन्न थे, साथ ही वह भारत छोड़कर जाने को तैयार न थे ..कहानी कार चुकि स्वाम अल्पसख्यक है अत ये बात वे भली भाँती जानते है और अंत ने उन्होंने इसे दिखाया भी है..लेखक में कहानी ने अल्पसख्यको पर जुल्म होता बताया है मगर वे भूल गए बात मुसलमानों या सिखों की नहीं बात सख्या की है...जम्मू काश्मीर में हिन्दू भी अल्पसख्यक है उनकी पीड़ा भी ऐसी ही है जैसी गुजरात के मुसलमानों की या दंगो में सिखों की ...अब समय आ गया है कि हम धर्मो से ऊपर उठे और मानवता को बचाए अगर हम मानव है ...बात धर्मो की नहीं बात मानवता की है ..अगर हम धर्म को बचाने में लगे रहे तो मानवता शायद ही ज़िंदा बचे ..हमें इस धर्मवाद से उबरना ही होगा
मेरे ख्याल से कहानी सामान्य स्तर से ऊपर की नहीं है..
आक्रोशित मन